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कुण्डलिनीस्तवः
कुण्डलिनी को स्तुति-गीत
प्रस्तावना
यह कुण्डलिनीस्तवः है जो पूजनीय रुद्रयामल-उत्तरतन्त्र के भीतर स्थित है। एक तन्त्र के भीतर होने के कारण, इसके रचयिता स्वयं प्रभु हैं, न कि कोई साधारण मनुष्य। «स्तवः» शब्द के मुख्य रूप से तीन अर्थ होते हैं: स्तुति, स्तुति-गीत, या स्तोत्र। और «कुण्डलिनी» वह शक्ति या परम शक्ति है जो शरीर में निवास करती है। इस शक्ति का जागरण ही सच्चे आध्यात्मिक मार्ग के आरंभ का प्रतीक है। इस संक्षिप्त स्तोत्र का गान करना अत्यंत सरल है और प्रायः इसे मेरी आध्यात्मिक परंपरा के उन सत्रों के दौरान गाया जाता है जिनमें कुण्डलिनी जागृत की जाती है। यह अत्यधिक कल्याणकारी है और कुण्डलिनी के जागरण का फल प्रदान करता है। मैं इसका अनुवाद करना चाहता था ताकि वे सभी जो इस स्तुति को पढ़ें और इसका गान करें, इस प्रकार अनुगृहीत हो सकें।
अब कुण्डलिनीस्तवः का पाठ करें और परम आनंद का अनुभव करें, प्रिय शिव।
महत्वपूर्ण: अनुवाद में जो कुछ भी कोष्ठक के भीतर है, वह किसी दिए गए वाक्यांश या वाक्य के अर्थ को पूर्ण करने के लिए मेरे द्वारा जोड़ा गया है। इसी प्रकार, जो कुछ भी दोहरे हाइफ़न (--...--) के बीच स्थित है, वह अतिरिक्त स्पष्टीकारक जानकारी प्रस्तुत करता है जो मेरे द्वारा ही जोड़ी गई है।
कुण्डलिनीस्तवः
जन्मोद्धारनिरीक्षणीह तरुणी वेदादिबीजादिमा नित्यं चेतसि भाव्यते भुवि कदा सद्वाक्यसञ्चारिणी।
मां पातु प्रियदासभावकपदं सङ्घातये श्रीधरा धात्रि त्वं स्वयमादिदेववनिता दीनातिदीनं पशुम्॥१॥
Janmoddhāranirīkṣaṇīha taruṇī vedādibījādimā nityaṁ cetasi bhāvyate bhuvi kadā sadvākyasañcāriṇī|
Māṁ pātu priyadāsabhāvakapadaṁ saṅghātaye śrīdharā dhātri tvaṁ svayamādidevavanitā dīnātidīnaṁ paśum||1||
(कुण्डलिनी) यहाँ --इस संसार में-- (अपने भक्तों को) जन्म (के चक्र) से मुक्त कराने की चेष्टा करती हैं (जन्मोद्धारनिरीक्षणी इह)। (वे) तरुणी --शाब्दिक अर्थ में, एक युवती-- हैं (तरुणी) जो बीज मन्त्रों में, (साथ ही) वेदों इत्यादि में आदिभूता हैं (वेदादिबीजादिमा)। पृथ्वी पर (भुवि), वे चित्त में (चेतसि) सदैव प्रकट होती हैं (नित्यम्... भाव्यते)। कभी-कभी --मैं «कदाचित्» अधिक पसंद करूँगा-- (कदा), वे ऋषियों के वचनों में संचारित/अभिव्यक्त होती हैं (सद्वाक्यसञ्चारिणी)। पूजनीय धात्री, मिलन --परमात्मा के साथ ऐक्य-- को प्राप्त कराने के लिए (सङ्घातये), मुझ (उनके) प्रिय दास के भाव की अवस्था में स्थित जीव की रक्षा करें (मां पातु प्रियदासभावकपदम्... श्रीधरा)! हे माता (धात्रि), आप (त्वम्) स्वयं (स्वयम्) आदिदेव की प्रिय पत्नी (हैं) (आदिदेववनिता)! (वे मेरी रक्षा करें, जो कि) दीनों से भी अत्यंत दीन पशु --अर्थात् बंधनग्रस्त जीव-- (हूँ) (पशुम्) (दीनातिदीनम्)!||१||
रक्ताभामृतचन्द्रिका लिपिमयी सर्पाकृतिर्निद्रिता जाग्रत्कूर्मसमाश्रिता भगवति त्वं मां समालोकय।
मांसोद्गन्धकुगन्धदोषजडितं वेदादिकार्यान्वितं स्वल्पस्वामलचन्द्रकोटिकिरणैर्नित्यं शरीरं कुरु॥२॥
Raktābhāmṛtacandrikā lipimayī sarpākṛtirnidritā jāgratkūrmasamāśritā bhagavati tvaṁ māṁ samālokaya|
Māṁsodgandhakugandhadoṣajaḍitaṁ vedādikāryānvitaṁ svalpasvāmalacandrakoṭikiraṇairnityaṁ śarīraṁ kuru||2||
(कुण्डलिनी) लाल कान्ति से युक्त हैं (रक्ताभा), अमृतमयी चन्द्रिका हैं (अमृतचन्द्रिका), अक्षरों से परिपूर्ण हैं (लिपिमयी), सर्प का आकार धारण करती हैं (सर्पाकृतिः), शयन करती हैं (निद्रिता), (और) जाग्रत अवस्था में कूर्मप्राण में निवास करती हैं --कूर्मप्राण पलक झपकाने का कार्य उत्पन्न करता है-- (जाग्रत्कूर्मसमाश्रिता)। हे भगवती (भगवति), मेरी ओर दृष्टिपात करें (मां समालोकय)! (मेरा शरीर) तीनों दोषों के विकारों के कारण जड़ हो गया है, तथा मांस की दुर्गन्ध से युक्त है (मांसोद्गन्धकुगन्धदोषजडितम्), (फिर भी) यह वैदिक अनुष्ठानों इत्यादि (के संपादन) से जुड़ा है (वेदादिकार्यान्वितम्)। अपनी स्वयं की करोड़ों निर्मल चन्द्र-किरणों के एक अत्यंत सूक्ष्म अंश से (स्वल्पस्वामलचन्द्रकोटिकिरणैः) (इस) शरीर को (शरीरम्) नित्य (नित्यम्) बना दीजिए (कुरु)!||२||
सिद्धार्थी निजदोषवित्स्थलगतिर्व्याजीयते विद्यया कुण्डल्या कुलमार्गमुक्तनगरी मायाकुमार्गः श्रिया।
यद्येवं भजति प्रभातसमये मध्याह्नकालेऽथवा नित्यं यः कुलकुण्डलीजपपदाम्भोजं स सिद्धो भवेत्॥३॥
Siddhārthī nijadoṣavitsthalagatirvyājīyate vidyayā kuṇḍalyā kulamārgamuktanagarī māyākumārgaḥ śriyā|
Yadyevaṁ bhajati prabhātasamaye madhyāhnakāle'thavā nityaṁ yaḥ kulakuṇḍalījapapadāmbhojaṁ sa siddho bhavet||3||
--इस श्लोक के प्रथम भाग में संस्कृत अत्यंत जटिल है। संभवतः शताब्दियों के अंतराल में कुछ त्रुटियाँ आ गई हैं। मैं अनुवाद तो कर रहा हूँ, परन्तु व्याकरणिक संरचना की असंगतियों को कुछ कल्पना से पूर्ण करना पड़ रहा है। सदा की भाँति, निष्कपटता सर्वोपरि है--
वह जो सिद्धि प्राप्त करने की अभिलाषा रखता है --इसके स्थान पर मैं «सिद्ध्यर्थी» की अपेक्षा करूँगा-- (सिद्धार्थी) (और) अपने दोषों को जानता है (निजदोषवित्), वह ज्ञानस्वरूपा कुण्डली के माध्यम से (विद्यया कुण्डल्या) पृथ्वी पर संचरण करते हुए (स्थलगतिः) विजयी होता है --शाब्दिक रूप से मैं «पराजित होता है» पढ़ता हूँ-- (व्याजीयते), (तथा) कुल --अर्थात् शक्ति-- के मार्ग से मुक्त पुरुषों की नगरी में (पहुँचता है) (कुलमार्गमुक्तनगरी)। माया का कुमार्ग (मायाकुमार्गः) पूजनीया और तेजोमयी देवी --कुण्डलिनी-- द्वारा (नष्ट कर दिया जाता है) (श्रिया)। यदि (यदि), प्रातःकाल (प्रभातसमये) अथवा (अथवा) मध्याह्न काल में (मध्याह्नकाले), वह कुलकुण्डली के जप --इस स्तोत्र के मंद पाठ-- के चरण-कमलों का (कुलकुण्डलीजपपदाम्भोजम्) इस प्रकार (एवम्) नित्य (नित्यम्) भजन करता है --वह «यः» अनावश्यक प्रतीत होता है-- (भजति... यः), तो वह (सः... भवेत्) सिद्ध (सिद्धः) हो जाता है||३||
वाय्वाकाशचतुर्दलेऽतिविमले वाञ्छाफलोन्मूलके नित्यं सम्प्रति नित्यदेहघटिता सङ्केतिता भाविता।
विद्या कुण्डलमानिनी स्वजननी मायाक्रिया भाव्यते यैस्तैः सिद्धकुलोद्भवैः प्रणतिभिः सत्स्तोत्रकैः शम्भुभिः॥४॥
Vāyvākāśacaturdale'tivimale vāñchāphalonmūlake nityaṁ samprati nityadehaghaṭitā saṅketitā bhāvitā|
Vidyā kuṇḍalamāninī svajananī māyā kriyā bhāvyate yaistaiḥ siddhakulodbhavaiḥ praṇatibhiḥ satstotrakaiḥ śambhubhiḥ||4||
हे कामनाओं के फलों का उन्मूलन करने वाली परम विमला देवी! (अतिविमले वाञ्छाफलोन्मूलके), (आपका) पारम्परिक (स्वरूप) (सङ्केतिता), चार दलों वाले (चक्र) में --मूलाधार में-- (जहाँ) वायु और आकाश (का वास है) (वाय्वाकाशचतुर्दले), नित्य शरीर से समन्वित रूप में (नित्यदेहघटिता), सम्यक् प्रकार से (सम्प्रति) सदैव ध्यात --अर्थात् ध्यान किया गया-- (होता है) (नित्यम् भाविता)। (वे जो) विद्या (हैं) (विद्या), (जो) परम पूजनीया कुण्डलिनी (हैं) (कुण्डलमानिनी), (जो) अपनी ही जननी (हैं) (स्वजननी), (जो) माया (माया) (और) क्रिया --क्रिया/कर्म-- (हैं) (क्रिया), उन लोगों द्वारा ध्यायी जाती हैं (भाव्यते) जो (यैः तैः) शम्भु --शिव-- के पावन स्तोत्रों द्वारा (सत्स्तोत्रकैः शम्भुभिः) (तथा) सिद्धों के कुल से उत्पन्न प्रणामों द्वारा (प्रणतिभिः) (उनकी उपासना करते हैं) (सिद्धकुलोद्भवैः) --यहाँ की संस्कृत तनिक क्लिष्ट है, ऐसा मुझे कहना होगा--||४||
धाताशङ्करमोहिनी त्रिभुवनच्छायापटोद्गामिनी संसारादिमहासुखप्रहरणी तत्र स्थिता योगिनी।
सर्वग्रन्थिविभेदिनी स्वभुजगा सूक्ष्मातिसूक्ष्मा परा ब्रह्मज्ञानविनोदिनी कुलकुटी व्याघातिनी भाव्यते॥५॥
Dhātāśaṅkaramohinī tribhuvanacchāyāpaṭodgāminī saṁsārādimahāsukhapraharaṇī tatra sthitā yoginī|
Sarvagranthivibhedinī svabhujagā sūkṣmātisūkṣmā parā brahmajñānavinodinī kulakuṭī vyāghātinī bhāvyate||5||
वहाँ --मूलाधार में-- स्थित होकर (स्थिता) (तत्र), योगिनी (योगिनी) शङ्कर और विधाता --ब्रह्मा-- को मोहित करती हैं (धाताशङ्करमोहिनी), तीनों लोकों --स्वर्ग, पाताल और पृथ्वी-- के छाया-रूपी आवरण को हटाती हैं (त्रिभुवनच्छायापटोद्गामिनी), संसार --आवागमन-- इत्यादि के महासुख का नाश करती हैं (संसारादिमहासुखप्रहरणी), सभी ग्रंथियों का भेदन करती हैं (सर्वग्रन्थिविभेदिनी), सर्प का रूप धारण करती हैं --शाब्दिक अर्थ में, «अपनी स्वयं की सर्पिणी हैं»-- (स्वभुजगा), सूक्ष्मतम से भी अति सूक्ष्म हैं (सूक्ष्मातिसूक्ष्मा), परा हैं (परा), ब्रह्मज्ञान के द्वारा आनंद प्रदान करने वाली हैं (ब्रह्मज्ञानविनोदिनी), (तथा) (अज्ञान पर) प्रहार कर उसका विनाश करने वाले (व्याघातिनी) कुण्डलाकार रूप से युक्त (कुलकुटी) मानी जाती हैं (भाव्यते)||५||
वन्दे श्रीकुलकुण्डलीं त्रिवलिभिः साङ्गैः स्वयम्भूप्रियां प्राविष्टाम्बरमारचित्तचपलां बालाबलानिष्कलाम्।
या देवी परिभाति वेदवदना सम्भावनी तापिनीष्टानां शिरसि स्वयम्भुवनितां सम्भावयामि क्रियाम्॥६॥
Vande śrīkulakuṇḍalīṁ trivalibhiḥ sāṅgaiḥ svayambhūpriyāṁ prāviṣṭāmbaramāracittacapalāṁ bālābalāniṣkalām|
Yā devī paribhāti vedavadanā sambhāvanī tāpinīṣṭānāṁ śirasi svayambhuvanitāṁ sambhāvayāmi kriyām||6||
मैं वंदना करता हूँ (वन्दे) पूजनीया श्रीकुलकुण्डली की (श्रीकुलकुण्डलीम्), जो स्वयम्भू की प्रियतमा हैं --उस स्वयंभू लिंग की, जिसके चारों ओर कुण्डलिनी मूलाधार में कुण्डली मारकर निवास करती हैं-- (स्वयम्भूप्रियाम्) (तथा अपने परिकरों के सभी) अंगों सहित तीन वलयों में (इस लिंग को घेरे रहती हैं) (त्रिवलिभिः साङ्गैः), उनकी जो आकाश में प्रविष्ट प्रेम से (परिपूर्ण) चित्त में इधर-उधर विचरण करती हैं --«प्रविष्ट» अधिक शुद्ध होगा-- (प्राविष्टाम्बरमारचित्तचपलाम्), उनकी जो कन्या, अबला और निष्कल हैं (बालाबलानिष्कलाम्)। जो देवी (देवी) (या) वेदों के मुख के रूप में शोभायमान होती हैं (वेदवदना) (परिभाति), वे अपने प्रियजनों के लिए (समस्त आवश्यक कार्यों का) संपादन करती हैं (सम्भावनी) (इष्टानाम्), (और जो प्रिय नहीं हैं उन्हें) संतप्त करती हैं (तापिनी)। मस्तक पर (शिरसि) स्वयंभू --शिव-- की प्रिय पत्नी (स्वयम्भुवनिताम्), (क्रियारूपा इस कुण्डलिनी) क्रिया की (क्रियाम्) मैं भावना/उपासना करता हूँ (सम्भावयामि)||६||
वाणीकोटिमृदङ्गनादमदना निश्रेणिकोटिध्वनिः प्राणेशी रसराशिमूलकमलोल्लासैकपूर्णानना।
आषाढोद्भवमेघराजिजनितध्वान्तानना स्थायिनी माता सा परिपातु सूक्ष्मपथगा मां योगिनां शङ्करी॥७॥
Vāṇīkoṭimṛdaṅganādamadanā niśreṇikoṭidhvaniḥ prāṇeśī rasarāśimūlakamalollāsaikapūrṇānanā|
Āṣāḍhodbhavamegharājijanitadhvāntānanā sthāyinī mātā sā paripātu sūkṣmapathagā māṁ yogināṁ śaṅkarī||7||
(कुण्डलिनी उस) मादकता के सदृश हैं (जो) करोड़ों मृदंगों --गले में पट्टी के सहारे लटकने वाला दो मुखी वाद्य-- और वाणियों के नाद से (उत्पन्न होती है) --यहाँ संस्कृत अत्यंत जटिल और अस्पष्ट है-- (वाणीकोटिमृदङ्गनादमदना)। (कुण्डलिनी) करोड़ों ऐसी ध्वनियों का उत्सर्जन करती हैं जो (शिव तक आरोहण के लिए) सीढ़ी का कार्य करती हैं --मैं यहाँ यही समझता हूँ, और हाँ, यह सब अत्यधिक क्लिष्ट है-- (निश्रेणिकोटिध्वनिः)। (वे) प्राणों की ईश्वरी हैं (प्राणेशी), (तथा) उस कमल की शोभा से युक्त परिपूर्ण मुख वाली हैं जिसका मूल अमृत का पुंज है (रसराशिमूलकमलोल्लासैकपूर्णानना)। (उनका) मुख आषाढ़ --जून और जुलाई के एक भाग से संबंधित मास-- में उठने वाली मेघ-माला से उत्पन्न अंधकार से युक्त है (आषाढोद्भवमेघराजिजनितध्वान्तानना)। सूक्ष्म मार्ग पर गमन करने वाली वे आधारभूता माता मेरी रक्षा करें (स्थायिनी माता सा परिपातु सूक्ष्मपथगा माम्)! वे योगियों के लिए (योगिनाम्) कल्याणकारी (शङ्करी) हैं||७||
त्वामाश्रित्य नरा व्रजन्ति सहसा वैकुण्ठकैलासयोरानन्दैकविलासिनीं शशिशतानन्दाननां कारणाम्।
मातः श्रीकुलकुण्डलीप्रियकले कालीकलोद्दीपने तत्स्थानं प्रणमामि भद्रवनिते मामुद्धर त्वं पशुम्॥८॥
Tvāmāśritya narā vrajanti sahasā vaikuṇṭhakailāsayorānandaikavilāsinīṁ śaśiśatānandānanāṁ kāraṇām|
Mātaḥ śrīkulakuṇḍalīpriyakale kālīkaloddīpane tatsthānaṁ praṇamāmi bhadravanite māmuddhara tvaṁ paśum||8||
आपका (त्वाम्) आश्रय लेकर (आश्रित्य), मनुष्य (नराः) तुरंत (सहसा) वैकुण्ठ और कैलास को --विष्णु और शिव के धामों को-- गमन करते हैं (वैकुण्ठकैलासयोः)। (वे आपकी शरण लेते हैं) जो केवल आनंद में ही विलास और संचरण करती हैं (आनन्दैकविलासिनीम्), (आपकी) जो कारणरूपा हैं (कारणाम्) (तथा) जिनका मुख सैकड़ों चन्द्रमाओं के आनंद को प्रकट करता है (शशिशतानन्दाननाम्)। हे माता (मातर्), हे पूजनीया कुलकुण्डली की प्रिय कला स्वरूपिणी --«कले» का अनुवाद «हे चन्द्र-कला» के रूप में भी किया जा सकता है-- (श्रीकुलकुण्डलीप्रियकले), हे काली के स्वरूप को उद्दीप्त करने वाली देवी (कालीकलोद्दीपने), मैं उस स्थान को प्रणाम करता हूँ --यह उस मूलाधार का संकेत करता है जहाँ कुण्डलिनी वास करती हैं-- (तत्स्थानम्)! हे कल्याणी देवी (भद्रवनिते), मुझ पशु का उद्धार करें --इस संसार के गहन अज्ञान से मुझे बाहर निकालें और मुझे उससे ऊपर उठाएँ-- (माम् उद्धर त्वम् पशुम्)!||८||
कुण्डलीशक्तिमार्गस्थः स्तोत्राष्टकमहाफलम्।
यः पठेत्प्रातरुत्थाय स योगी भवति ध्रुवम्॥९॥
Kuṇḍalīśaktimārgasthaḥ stotrāṣṭakamahāphalam|
Yaḥ paṭhetprātarutthāya sa yogī bhavati dhruvam||9||
जो मनुष्य (यः) कुण्डलीशक्ति के मार्ग पर स्थित होकर (कुण्डलीशक्तिमार्गस्थम्) प्रातःकाल उठकर (प्रातरुत्थाय) महाफलदायी इस अष्टक-स्तोत्र का (स्तोत्राष्टकमहाफलम्) पाठ करता है (पठेत्), वह (सः... भवति) निश्चित रूप से (ध्रुवम्) योगी बन जाता है (योगी)||९||
क्षणादेव हि पाठेन कविनाथो भवेदिह।
पवित्रः कुण्डलीयोगी ब्रह्मलीनो भवेन्महान्॥१०॥
Kṣaṇādeva hi pāṭhena kavinātho bhavediha|
Pavitraḥ kuṇḍalīyogī brahmalīno bhavenmahān||10||
पाठ करने से (पाठेन), वह इस संसार में (इह) क्षण भर में ही (क्षणात् एव हि) कवियों का स्वामी बन जाता है (कविनाथः) (भवेत्)। वह जो कुण्डली के योग का अभ्यास करता है (कुण्डलीयोगी), ब्रह्म में लीन होकर (ब्रह्मलीनः) पवित्र (पवित्रः) (और) महान बन जाता है (महान्) (भवेत्)||१०||
इति ते कथितं नाथ कुण्डलीकोमलं स्तवम्।
एतत्स्तोत्रप्रसादेन देवेषु गुरुगीष्पतिः॥११॥
Iti te kathitaṁ nātha kuṇḍalīkomalaṁ stavam|
Etatstotraprasādena deveṣu gurugīṣpatiḥ||11||
इस प्रकार (इति), हे नाथ! (नाथ), कुण्डली का यह कोमल स्तुति-स्तोत्र (कुण्डलीकोमलम् स्तवम्) आपसे कहा गया (कथितम्) (ते)। इस स्तोत्र की कृपा से (एतत्स्तोत्रप्रसादेन), (साधक) देवताओं में (देवेषु) देवगुरु (बृहस्पति) के समान वाणी के स्वामी रूपी ज्ञान से संपन्न बन जाता है (गुरुगीष्पतिः)||११||
सर्वे देवाः सिद्धियुता अस्याः स्तोत्रप्रसादतः।
द्विपरार्धं चिरञ्जीवी ब्रह्मा सर्वसुरेश्वरः॥१२॥
Sarve devāḥ siddhiyutā asyāḥ stotraprasādataḥ|
Dviparārdhaṁ cirañjīvī brahmā sarvasureśvaraḥ||12||
इनके स्तोत्र की कृपा से (अस्याः स्तोत्रप्रसादतः), समस्त (सर्वे) देवता (देवाः) सिद्धियों से युक्त होते हैं (सिद्धियुताः)। समस्त देवताओं के स्वामी (सर्वसुरेश्वरः), दीर्घजीवी (चिरञ्जीवी) ब्रह्मा (ब्रह्मा), दो परार्ध तक (जीवित रहते हैं) --एक «परार्ध» 100,000,000,000,000,000 मानव वर्षों के बराबर होता है-- (द्विपरार्धम्)||१२||
॥इति रुद्रयामलोत्तरतन्त्रान्तर्गतः कुण्डलिनीस्तवः सम्पूर्णः॥
||Iti rudrayāmalottaratantrāntargataḥ kuṇḍalinīstavaḥ sampūrṇaḥ||
||इस प्रकार (इति), कुण्डलिनी का स्तुति-स्तोत्र (कुण्डलिनीस्तवः), जो रुद्रयामलोत्तरतन्त्र के अंतर्गत स्थित है (रुद्रयामलोत्तरतन्त्रान्तर्गतः), पूर्ण हुआ (सम्पूर्णः)||
अतिरिक्त जानकारी
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